खूंटी: ग्राम बुदुदीह में रविवार को झारखंड लोक कलाकार संघ, खूंटी जिला इकाई का पुनर्गठन एवं शपथ ग्रहण समारोह बड़े उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर स्थानीय कलाकारों, समाजसेवियों, शिक्षाविदों और संस्कृति प्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। सर्वसम्मति से लखन गुड़िया को संघ का अध्यक्ष, बलेदास मुंडा को सचिव, तथा मानसिंह बोदरा को उपसचिव चुना गया। वहीं मानसा हजाम को कोषाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया। कार्यकारिणी सदस्य के रूप में गुरु मुंडा, सागर पूर्ति, सनिका मुंडा, अंजनि पूर्ति, यमुना मुंडु, सावित्री पूर्ति, गुरु दयाल लोहरा, राजेंद्र महतो, कूप सिंह मुंडा, और राहिल कुमारी का चयन सर्वसम्मति से किया गया। शपथ ग्रहण समारोह में नवगठित पदाधिकारियों ने पारंपरिक मुंडारी रीति-रिवाजों के अनुसार शपथ ली और संघ के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का मुख्य विषय रहा — “मुंडारी लोक नृत्य का संरक्षण और संवर्धन”।
समारोह में वक्ताओं ने कहा कि आज जब आधुनिकता और बाजारवाद की लहर में पारंपरिक कलाएं तेजी से विलुप्त हो रही हैं, ऐसे समय में झारखंड लोक कलाकार संघ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मुंडारी गीत, नृत्य और पारंपरिक लोकसंगीत न केवल सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि यह समुदाय की पहचान, इतिहास और जीवनदर्शन से जुड़े हुए हैं। इन्हें जीवित रखना नई पीढ़ी के सांस्कृतिक भविष्य की रक्षा के समान है। मुंडा समाज का सांस्कृतिक वैभव उसकी भाषा, नृत्य, गीत और अनुष्ठानों में निहित है। यदि इन परंपराओं की सुरक्षा नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से कट जाएँगी। इस अवसर पर यह निर्णय लिया गया कि ग्राम स्तर पर लोक कलाकारों की पहचान, प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन, और विद्यालयों में लोकसंस्कृति आधारित कार्यशालाओं का नियमित आयोजन किया जाएगा, ताकि युवाओं में पारंपरिक संगीत और नृत्य के प्रति रुचि उत्पन्न की जा सके।
बैठक में अनु टिडू, सुमित टूटी, मंदरू मुंडा, बुधलाल चुटिया, पूर्ति हिसि हास्सा, सुसाना नाग, नीलम कुमारी, मरसा हास्सा, पुष्पा कुमारी, सुमी पूर्ति, बाँचोन स्वासी, रोशन पूर्ति, मंगा मुंडा, जुगल मुंडा, संबरय मुंडा, बिटु मुंडा सहित अनेक स्थानीय कलाकार एवं समाजसेवी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में पारंपरिक मुंडारी ढोल-नगाड़ों की थाप पर लोक कलाकारों ने नृत्य प्रस्तुत किया, जिससे पूरा परिसर लोकसंगीत की मधुर ध्वनियों से गूंज उठा। इस सांस्कृतिक प्रस्तुति ने न केवल झारखंड की समृद्ध लोक परंपरा का परिचय कराया, बल्कि उपस्थित सभी लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश भी दिया। अध्यक्ष लखन गुड़िया ने अपने संबोधन में कहा कि “हमारा लक्ष्य है — झारखंड की लोककला, गीत-संगीत और नृत्य को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाना। जब तक हम अपनी संस्कृति को नहीं सहेजेंगे, हमारी पहचान अधूरी रहेगी।” साथ ही पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा की यह युक्ति — “जे नाची से बांची” — इस गहरे विश्वास को व्यक्त करती है कि नृत्य मात्र मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और अस्तित्व को जीवित रखने का माध्यम है।

