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Home»#Trending News»रांची विश्वविद्यालय के मुंडारी विभाग में व्याख्यान, शोध से भाषा-संस्कृति के विकास पर जोर
#Trending News

रांची विश्वविद्यालय के मुंडारी विभाग में व्याख्यान, शोध से भाषा-संस्कृति के विकास पर जोर

मुंडारी कला, संस्कृति और शिक्षा: वर्तमान दौर” विषय पर संबोधन; शोधार्थियों को क्षेत्रीय अध्ययन के माध्यम से आदिवासी कला-संस्कृति को सामने लाने की सलाह
अबुआ न्यूजBy अबुआ न्यूजMarch 8, 2026Updated:March 8, 2026No Comments3 Mins Read
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रांची: रांची विश्वविद्यालय के मुंडारी विभाग में 7 मार्च 2026, शनिवार को एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर झारखंड सरकार के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के संयुक्त सचिव कुंवर पाहन ने “मुंडारी कला, संस्कृति और शिक्षा: वर्तमान दौर” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने संबोधन में पाहन ने कहा कि शोध कार्य के माध्यम से भाषा और समाज की दशा एवं दिशा दोनों को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि क्षेत्रीय कार्य को बहुत ही बारीकी और गंभीरता से करना आवश्यक है, क्योंकि इसी के माध्यम से भाषा और साहित्य के अनेक अनछुए रहस्य समाज के सामने आ सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि झारखंड की आदिवासी कला और संस्कृति का अभी भी पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हुआ है। कई पारंपरिक ज्ञान, लोककलाएं, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक परंपराएं अभी भी दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं हो पाई हैं। इसलिए शोधार्थियों की जिम्मेदारी है कि वे इन विषयों पर गंभीर शोध करें और समाज के सामने इनकी वास्तविक महत्ता को प्रस्तुत करें। कुंवर पाहन ने कहा कि झारखंड की उन्नति का सबसे मजबूत आधार शिक्षा है। यदि शिक्षा को सही दिशा में आगे बढ़ाया जाए और स्थानीय भाषाओं तथा संस्कृतियों को इसमें उचित स्थान दिया जाए, तो यह राज्य के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने से विद्यार्थियों की समझ और ज्ञान का स्तर और अधिक मजबूत होता है।

उन्होंने मुंडारी भाषा और साहित्य के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान और सांस्कृतिक धरोहर है। इसलिए इसका संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने शोधार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे अपने अध्ययन के माध्यम से मुंडारी भाषा, लोक साहित्य, लोकगीत, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को दस्तावेज़ के रूप में संरक्षित करने का प्रयास करें।

विभागाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र कुमार सोय ने भी अपने विचार साझा किए और कहा कि इस प्रकार के व्याख्यान शोधार्थियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक होते हैं। इससे उन्हें अपने शोध कार्य को बेहतर दिशा में आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है। असिस्टेंट प्रोफेसर करम सिंह मुंडा ने भी वक्ता का स्वागत करते हुए उनके विचारों को शोध और अकादमिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम में उपस्थित शोधार्थियों ने भी इस व्याख्यान को ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक बताया।

 

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