रांची: रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय स्थित पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा अखड़ा में मुंडारी विभाग द्वारा एक महत्वपूर्ण मुंडारी साहित्य परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य मुंडारी भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा उसके संरक्षण एवं संवर्धन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श करना था। परिचर्चा में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी, साहित्यकार एवं भाषा प्रेमियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुंडारी विभाग के शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक गोवारी एवं स्वागत गीत से हुआ, जिसने उपस्थित लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य किया। इसके बाद मुंडारी विभागाध्यक्ष डॉ. बिरेन्द्र कुमार सोय ने सभी अतिथियों का शॉल ओढ़ाकर स्वागत किया। अपने स्वागत संबोधन में डॉ. सोय ने कहा कि पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा के नेतृत्व काल में विभाग में नियमित रूप से विचार गोष्ठियों, संगोष्ठियों और सेमिनारों का आयोजन किया जाता था, जिनके माध्यम से भाषा और साहित्य के विकास की दिशा तय की जाती थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी ऐसी परिचर्चाओं की आवश्यकता पहले से अधिक है, क्योंकि इनके माध्यम से भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए ठोस रणनीतियां तैयार की जा सकती हैं। कार्यक्रम में डॉ. किशोर सुरीन ने मुंडारी विभाग की स्थापना से लेकर वर्तमान तक की विकास यात्रा पर प्रकाश डालते हुए विभाग की उपलब्धियों, शैक्षणिक गतिविधियों तथा शोध कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में शोध एवं प्रकाशन कार्यों को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने युवा शोधार्थियों को गंभीर अनुसंधान और साहित्य सृजन के लिए प्रेरित किया। मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सत्यनारायण मुंडा, पूर्व कुलपति डीएसपीएमयू, रांची ने कहा कि मुंडारी भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि समृद्ध संस्कृति, परंपरा और ज्ञान की वाहक है। उन्होंने कहा कि मुंडारी भाषा का प्रत्येक शब्द अपने भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुभव और गहन अर्थ समेटे हुए है। उन्होंने भाषा के अध्ययन, अनुसंधान और प्रचार-प्रसार को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि सामूहिक प्रयासों के माध्यम से मुंडारी भाषा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई जा सकती है। जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (टीआरआई), रांची के सेवानिवृत्त उपनिदेशक सोमा सिंह मुंडा ने कहा कि किसी भी भाषा और साहित्य को जीवंत बनाए रखने के लिए पढ़ने और लिखने की संस्कृति का विकास अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डिजिटल तकनीक का युग है तथा मुंडारी भाषा के क्षेत्र में भी तकनीकी स्तर पर महत्वपूर्ण कार्य हो रहे हैं। इससे भविष्य में मुंडारी भाषा को वैश्विक मंच पर पहचान मिलने की संभावनाएं और अधिक मजबूत होंगी। डॉ. मनसिद्ध बड़ायउद ने साहित्य सृजन, शोध एवं प्रकाशन में शिक्षकों और शोधकर्ताओं की सक्रिय भूमिका को आवश्यक बताया। कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के लिए पारंपरिक नामों, लोककथाओं, सांस्कृतिक प्रतीकों और लोकज्ञान पर आधारित प्रश्नोत्तर सत्र का भी आयोजन किया गया। प्रतिभागियों ने इसे ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक बताया। इस सत्र ने युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। परिचर्चा के दौरान एतवा मुंडा ने भाषा को रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि यदि मुंडारी भाषा को शिक्षा, तकनीक, प्रशासन और रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाए तो युवाओं में भाषा के प्रति रुचि बढ़ेगी। इससे न केवल भाषा संरक्षण को बल मिलेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

मुंडारी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष मनय मुंडा ने कहा कि किसी भी भाषा का विकास सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। उन्होंने समाज, शिक्षकों, विद्यार्थियों और साहित्यकारों से मिलकर भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में कार्य करने का आह्वान किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अजीत मुंडा एवं जुरा होरो ने संयुक्त रूप से किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. करम सिंह मुंडा ने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर विशेश्वर मुंडा, डॉ. जुरन सिंह मानकी, गुंजल इकिर मुंडा, साबित्री कुमारी, वासुदेव हासा, इंदिरा कोंगाड़ी, डॉ. सिजेरेन सुरीन, डॉ. लखिन्द्र मुंडा, सबरन सिंह मुंडा, महावीर मुंडा, करम सिंह ओड़ेया, डॉ. सोहन मुंडा, इसाबेला होरो, मार्शल पूर्ति, डॉ. खातिर हेम्ब्रोम, डॉ. अलबिना जोजो, लवलिन होरा, विनाधर सांडिल, रचना होरो, सेरोफिना हेम्ब्रोम, अनीता मिंजुर, लेबेयान मुंडु सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
परिचर्चा में कहा कि मुंडारी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए आधुनिक तकनीक, शिक्षा और रोजगार के साथ उसका समन्वय आवश्यक है। कार्यक्रम ने भाषा के भविष्य को लेकर नई संभावनाओं, सकारात्मक चिंतन और सामूहिक प्रयासों का संदेश दिया तथा यह स्पष्ट किया कि भाषा को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर ही उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सशक्त और प्रासंगिक बनाया जा सकता है।

