रांची: रांची यूनिवर्सिटी द्वारा डोरंडा कॉलेज, राम लखन सिंह यादव कॉलेज, मारवाड़ी कॉलेज और एस.एस. मेमोरियल कॉलेज से बंगाली विषय हटाकर केवल धुर्वा कॉलेज में सीमित किए जाने की खबर सामने आने के बाद बांग्लाभाषी समुदाय में चिंता बढ़ गई है। यदि यह निर्णय सही साबित होता है, तो इसे झारखंड के लाखों बांग्लाभाषी छात्रों के शैक्षणिक अधिकारों और भाषाई पहचान पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कदम माना जा रहा है। झारखंड एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक राज्य है, जहाँ बड़ी संख्या में बांग्लाभाषी परिवार कई पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थानों से बंगाली विषय को सीमित करना केवल एक शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा संवेदनशील विषय बन गया है।
भाषाई अधिकारों की दृष्टि से भी यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 भाषाई एवं सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 350A राज्यों को मातृभाषा में शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने की भावना को मजबूत करता है। इसके अलावा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) तथा नई शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन पर विशेष बल देती है। सामाजिक संगठनों और भाषा प्रेमियों का कहना है कि यदि कई कॉलेजों से बंगाली विषय समाप्त कर दिया जाता है, तो बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं के सामने उच्च शिक्षा प्राप्त करने की गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है। आर्थिक रूप से कमजोर और दूरदराज क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए केवल एक कॉलेज में पढ़ाई की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। इससे कई छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
झारखंड बंगला भाषा उन्नयन समिति की रीना मंडल ने कहा कि बांग्ला केवल एक भाषा नहीं, बल्कि झारखंड की ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने मांग की कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों, भाषा विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों से व्यापक संवाद किया जाए। उन्होंने कहा कि सभी भाषाओं को समान अवसर देना ही लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की वास्तविक भावना है। बांग्लाभाषी छात्रों के शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा करना समय की आवश्यकता है।

