रांची: रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में मुंडा होड़ो उत्थान मंच एवं विश्वविद्यालय मुंडारी विभाग, रांची के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित प्रतिभा सम्मान समारोह 2026, भाषा, संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा। समारोह में झारखंड सहित नेपाल, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से आए बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा विद्यार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य मुंडारी भाषा, साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के संरक्षण तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए प्रेरित करना था। कार्यक्रम का शुभारंभ जगलाल पहान द्वारा पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ किया गया। इसके पश्चात सभी उपस्थित लोगों ने सिङबोंगा की गोवारी दुराङ के माध्यम से ईश्वर की स्तुति कर समाज की उन्नति और समृद्धि की कामना की। सांस्कृतिक कार्यक्रम में लखन गुड़िया एवं सुखराम पहान के नेतृत्व में कलाकारों ने पारंपरिक लोकगीत और नृत्य प्रस्तुत कर वातावरण को उत्साह और उमंग से भर दिया। 
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि मुंडा समुदाय अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मूल्यों के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। उन्होंने धरती आबा बिरसा मुंडा से लेकर पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा तक के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज को अपनी भाषा, संस्कृति और धार्मिक पहचान को संरक्षित करने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे। उन्होंने विद्यार्थियों को शिक्षा के माध्यम से नई ऊंचाइयों तक पहुंचने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया। सम्मानित विद्यार्थियों की उज्जवल भविष्य हो। टीआरआई, रांची के पूर्व उपनिदेशक सोमा सिंह मुंडा ने गितिओड़ा परंपरा को समाज की ज्ञान-संपदा बताते हुए कहा कि यह साहित्य, धर्म, विज्ञान और दर्शन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। वहीं शिक्षाविद अरुण कुमार सिंह ने विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों को भी आवश्यक बताया। विश्वविद्यालय मुंडारी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बिरेन्द्र कुमार सोय ने कहा कि मुंडाओं का इतिहास, भाषा और सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही है। उन्होंने युवाओं से मातृभाषा और परंपराओं के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होने गीत के माध्यम से बताया चि हो मुंडाम दुडुम जाना चि? ओको कोचा रेबेदे रेम हापेन जाना? यानि डॉ सोय ने चिंता व्यक्त किया कि आप कहां सो गए, किस कोने छिप गए। 
विशेष काउंसलिंग सत्र में डीएसपीएमयू के पूर्व कुलपति प्रो. सत्यनारायण मुंडा ने विद्यार्थियों को कठिन परिश्रम, अनुशासन और निरंतर प्रयास को सफलता का मूलमंत्र बताया। उन्होंने कहा कि लक्ष्य निर्धारित कर निरंतर प्रयास करने वाले विद्यार्थी ही जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। डॉ. अजीत मुंडा ने पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा की प्रसिद्ध उक्ति “जे नाची से बांची” का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृति, कर्म और सृजनशीलता जीवन की सफलता की आधारशिला हैं। उन्होंने कहा कि एआई के युग में मातृभाषाओं के संरक्षण और प्रसार के लिए नई तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए। साथ ही मुंडारी भाषा को विद्यालय से विश्वविद्यालय स्तर तक सुदृढ़ करने और रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। सभी वक्ताओं ने भाषा, पढ़ाई के महत्व के बारे बताया जो विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक रहा। कार्यक्रम में नेपाल से कृष्ण कुमार मुंडा, विश्वदेव मुंडा, हरि मुंडा, श्याम मुंडा एवं किष्टो कुमार मुंडा, ओडिशा से भरत चन्द्र मुंडा, बीरबल मुंडा तथा पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त नंदलाल सिंह, देवीदयाल मुंडा, बोध मुंडा, अनिल सिंह मुंडा, शम्भु नारायण मुंडा, प्रभाकरण मुंडा, लक्की मुंडा, दिनेश मुंडा, ज्योत्सना केरकेट्टा, सबरन मुंडा, डॉ. लखिन्द्र मुंडा, डॉ. जुरन सिंह मुंडा, गोपीनाथ मुंडा सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

