रांची: लंबे अंतराल के बाद रांची विश्वविद्यालय के मुंडारी विभाग में शोधार्थियों के लिए कोर्स वर्क का औपचारिक शुभारंभ जनवरी 2026 को किया गया। यह कार्यक्रम आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। कोर्स वर्क का उद्देश्य शोधार्थियों को शोध पद्धति, अनुसंधान की बारीकियों तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भाषा एवं साहित्य के अध्ययन हेतु सक्षम बनाना है, ताकि शोध कार्य अकादमिक सीमाओं से आगे बढ़कर समाज और नीति निर्माण में उपयोगी सिद्ध हो सके।
इस अवसर पर रांची विश्वविद्यालय के कुल सचिव डॉ. गुरुचरण साहू मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुंडारी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र कुमार सोय ने की। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. सत्यनारायण मुंडा उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त नागपुरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश नंद तिवारी, कुरुख विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बंदे खलखो, खड़िया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. किरण कुल्लू, संथाली विभाग के विभागाध्यक्ष प्रेम मुर्मू तथा मुंडारी विभाग के सहायक प्राध्यापक करम सिंह मुंडा भी मंचासीन रहे। कार्यक्रम में मुंडारी विभाग के सभी शोधार्थियों की उत्साहपूर्ण एवं सक्रिय उपस्थिति रही। अपने संबोधन में कुल सचिव डॉ. गुरुचरण साहू ने शोधार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि शोध कार्य केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह समाज, भाषा और संस्कृति के संरक्षण एवं विकास का सशक्त माध्यम बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी भाषाओं और साहित्य पर किया गया शोध भविष्य में सरकारी नीतियों, शिक्षा योजनाओं और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने शोधार्थियों से गंभीर, मौलिक और समाजोपयोगी शोध करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. सत्यनारायण मुंडा ने शोधार्थियों को कोर्स वर्क की बारीकियों से अवगत कराते हुए शोध विधि एवं अनुसंधान के विभिन्न तरीकों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शोधार्थियों को अपने विषय का चयन करते समय समाज की वास्तविक जरूरतों, परंपरागत ज्ञान और समकालीन चुनौतियों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आदिवासी समाज की परंपराओं, लोकज्ञान, भाषा और साहित्य को वैज्ञानिक पद्धति से प्रस्तुत करना आज की बड़ी आवश्यकता है, ताकि शोध के निष्कर्ष नीति निर्माण (पॉलिसी मेकिंग) में प्रभावी रूप से उपयोग किए जा सकें।
मुंडारी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र कुमार सोय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि कोर्स वर्क शोधार्थियों के लिए शोध की मजबूत नींव तैयार करता है। इसके माध्यम से शोधार्थियों को शोध प्रस्ताव लेखन, फील्ड वर्क, डेटा संकलन, विश्लेषण और संदर्भ सामग्री के वैज्ञानिक उपयोग की स्पष्ट दिशा मिलती है। उन्होंने कहा कि मुंडारी भाषा एवं साहित्य का अध्ययन न केवल अकादमिक क्षेत्र को समृद्ध करेगा, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को भी सशक्त बनाएगा।
अन्य विभागाध्यक्षों ने भी अपने विचार रखते हुए क्षेत्रीय और आदिवासी भाषाओं के अंतर्विषयक (इंटर-डिसिप्लिनरी) अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विभिन्न भाषाओं और विभागों के शोधार्थियों के बीच आपसी संवाद, सहयोग और साझा शोध से अनुसंधान की गुणवत्ता और प्रभावशीलता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
कार्यक्रम का समापन शोधार्थियों के उत्साहवर्धन एवं उनके उज्ज्वल शोध भविष्य की कामना के साथ किया गया। यह कोर्स वर्क न केवल शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा, बल्कि रांची विश्वविद्यालय में आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के अध्ययन को नई दिशा, ऊर्जा और पहचान प्रदान करेगा।

