खूंटी: झारखंड के खूंटी जिले में स्थित सुकान बुरु पर्व इस वर्ष बड़े ही श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। मुंडा समुदाय में पहाड़ देवता की पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। समाज की मान्यता है कि पहाड़ ही जीवन का मूल आधार हैं, जो अन्न, फल-फूल, कंद-मूल और प्राकृतिक संसाधन प्रदान करते हैं। इसी आस्था के साथ सुकान बुरु में पहाड़ देवता का सुम्मन (पूजन) विधिवत रूप से किया गया। सुकान बुरु पर्व को सफल बनाने में दुलमी, टोटाः दाः और सुकानडीह के ग्रामीणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। ग्रामीणों ने बैठक कर आयोजन की रूपरेखा तैयार की और मेले को पारंपरिक गरिमा के साथ संपन्न कराया। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक सहभागिता का भी प्रतीक है।
सुकान बुरु की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यहां परंपरागत रूप से पतंग उड़ाने की अनूठी परंपरा चली आ रही है। इस अवसर पर छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी रंग-बिरंगी और आकर्षक पतंग उड़ाते नजर आए। आकाश में लहराती पतंगें उत्सव के उल्लास और सामूहिक खुशी का प्रतीक बनीं। इस वर्ष पतंग निर्माण और उड़ाने की प्रक्रिया को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 8 से 11 दिसंबर तक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में प्रतिभागियों को बड़े, सुंदर और टिकाऊ पतंग बनाने के गुर सिखाए गए। कार्यशाला में उत्कृष्ट पतंग बनाने एवं कुशलतापूर्वक उड़ाने वाले प्रतिभागियों को प्रोत्साहन स्वरूप प्रमाण पत्र, मोमेंटो
और टी-शर्ट देकर सम्मानित किया गया। इससे युवाओं और बच्चों में पारंपरिक ज्ञान के प्रति रुचि और गर्व की भावना देखने को मिली।
पहानों द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। नृत्य और संगीत मुंडा समाज की आत्मा माने जाते हैं। इस संदर्भ में पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा के प्रसिद्ध कथन “जे नाची, से बांची” को याद किया गया, जो आदिवासी जीवन-दर्शन में नृत्य और संगीत के महत्व को रेखांकित करता है। कार्यक्रम में पारंपरिक नृत्य, लोकगीत और वाद्ययंत्रों की गूंज ने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया। इस वर्ष सुकान बुरु पर्व की एक और विशेष उपलब्धि रही—दो पुस्तकों का विमोचन। रबिन्द्र सिंह मुंडा की पुस्तक “आलाए जी” तथा हरे कृष्ण की “Beats of the Buru, A Poetic Memory of Sukan Buru” का विधिवत लोकार्पण किया गया। इन पुस्तकों में सुकान बुरु की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और स्मृतिपरक परंपराओं को साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। मेले में खूंटी, रांची, चाईबासा, ओडिशा सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए मेला प्रेमियों की भारी भीड़ उमड़ी। अनुमानतः लाखों की संख्या में श्रद्धालु और दर्शक इस पर्व के साक्षी बने। सुकान बुरु पर्व ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि आदिवासी परंपराएं आज भी जीवंत हैं और सामूहिक चेतना के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से हस्तांतरित हो रही हैं।

