रांची : पद्मश्री से सम्मानित विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. तुलसी मुंडा, जिन्हें लोग स्नेहपूर्वक ‘तुलसी आपा’ के नाम से जानते हैं, आज भी आदिवासी बच्चों के जीवन में शिक्षा, संस्कृति और जागरूकता की ज्योति प्रज्वलित करने में निरंतर सक्रिय हैं। 15 जुलाई 1947 को ओडिशा के क्योंझर जिले के कईश गांव के गोपालपाशी में जन्मी तुलसी मुंडा सात भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। उनके माता-पिता घस मुंडा और चरण मुंडा थे। आर्थिक स्थिति और संसाधनों की कमी के कारण उन्हें बचपन में विद्यालय जाने का अवसर नहीं मिला, परंतु ज्ञान प्राप्ति की उनकी ललक अद्भुत थी। उनके मौसेरे भाई कुसुनु मुंडा जमीन पर लकीरें खींच-खींचकर उन्हें पढ़ाते थे, जिससे उन्होंने अक्षर और शब्द पहचानना सीखा। उनकी स्मरण शक्ति बेहद तीव्र थी, जिसके कारण थोड़ी सी शिक्षा ने ही उनका दृष्टिकोण विस्तृत कर दिया। डॉ. तुलसी मुंडा ने अपनी जीवनधारा को दिशा मालती देवी चौधरी के सान्निध्य में पाई, जिन्हें वे अपना गुरु मानती हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें अनेक स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों से मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, जिसने उनके भीतर समाज सेवा के प्रति गहरी संवेदना और संकल्प का संचार किया। आज उन्हें छ: यूनिवर्सिटी ने डॉक्तेरेट की उपाधि से नवाजा गया है। तुलसी आपा का सबसे बड़ा योगदान आदिवासी शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना है। ओडिशा के बड़बिल स्थित सेरेन्डा में संचालित उनका बाल आश्रम आज लगभग 697 बच्चों के लिए शिक्षा, अनुशासन, संस्कार, आत्मनिर्भरता और मानवीय मूल्यों का पोषण केंद्र है। आश्रम में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल, प्रार्थना गृह, भोजनालय, स्वच्छता और सुरक्षित पेयजल की उत्तम व्यवस्था है। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ खेल, सांस्कृतिक गतिविधियाँ, स्वच्छता, पर्यावरण और व्यक्तित्व निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
रुम्बुल और मुंडारी साहित्य परिषद के सदस्य प्रो. मनय मुंडा, डॉ. बीरेन्द्र कुमार सोय और डॉ. अजीत मुंडा से मुंडारी भाषा में हुई विशेष चर्चा के दौरान तुलसी आपा ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने मुंडा समुदाय के महान व्यक्तित्वों जैसे मरङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा, एन. ई. होरा, बागुन सुब्रोई, पद्पमभूषण कड़िया मुंडा, पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा, तथा झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा के योगदानों को याद करते हुए आदिवासी समाज के उत्थान में उनकी भूमिका पर चर्चा की। साथ ही उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा, उनकी जन्मस्थली उलिहातु गाँव, वहाँ के विकास, और संस्कृति संरक्षण के महत्व पर भी गहरी चिंता व्यक्त की।
डॉ. तुलसी मुंडा ने आज के युवाओं में बढ़ते सांस्कृतिक विचलन पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि भाषा, संस्कृति और पहचान के बिना कोई भी समुदाय जीवित नहीं रह सकता। उन्होंने मुंडारी भाषा में कहा “आबुआ जगार-ससंकिर आबुआ उनुरुम; जामा ते बनचाओ लगतिङआ।” आदिवासी समाज में साक्षरता, जागरूकता और सामाजिक परिवर्तन के उनके अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2001 में पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया। आज भी “तुलसी आपा” सेवा, समर्पण और प्रेरणा की प्रतिमूर्ति के रूप में समाज को नई राह दिखा रही हैं।

