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Home»राज्य»झारखंड»धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा : भूमि संघर्ष और जनजातीय जीवन की शक्ति
झारखंड

धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा : भूमि संघर्ष और जनजातीय जीवन की शक्ति

उलिहातू से उठी एक लौ जिसने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी—उलगुलान (1895–1900), भूमि संघर्ष, बिरसाइट धर्म, डोम्बारी बुरू जनसंहार और CNT Act तक की ऐतिहासिक यात्रा।
अबुआ न्यूजBy अबुआ न्यूजNovember 14, 2025Updated:November 15, 2025No Comments10 Mins Read
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रांची: भारतीय जनजातियाँ प्राचीन काल से ही प्रकृतिवादी धर्म से जुड़ी रहीं – जिसमें जल, जंगल और जमीन ही धर्म का केंद्र है। ग्रामसभा, अखड़ा और मदद प्रथा जनजातीय समाज की सामाजिक-आर्थिक एकता का आधार था। ब्रिटिश शासन के आगमन के साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1764 तक अपनी जड़ें जमा चुकी थी और अधिकतम राजाओं ने ब्रिटिश हुकुमत की गुलामी स्वीकार कर ही थी और इनके द्वारा लगान प्रणाली, जमींदारी और महाजनी प्रथा ने यहां के समुदायों का जीवन दूभर कर दिया। बेठबेगारी (जबरन श्रम) और रैयतों का शोषण बढ़ा। परिणामस्वरूप कई विद्रोह हुए — तमाड़ विद्रोह (1794), कोल विद्रोह (1831–32), जिन्होंने आगे चलकर उलगुलान की नींव रखी। इसी समय धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और उलगुलान के उस अध्याय का नाम हैं, जहाँ जनजातीय समाज ने अपने स्वराज, अस्मिता और प्राकृतिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनका जीवन पर्यावरण, भूमि और समुदाय की एकता का प्रतीक था।

भगवान बिरसा मुंडा का जीवन और शिक्षा 

 भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर, 1875 को उलिहातू ( मुंडारी अर्थ उलि यानि आम और हातु अर्थात एक खूंटकटी बड़ा गांव है) पिता सुगना मुंडा और माता करमी मुंडा के घर तीन पुत्र एवं दो पुत्री में संझले पुत्र के रूप में वृहस्पतिवार को बिरसा मुंडा (खूँटी, झारखंड) के रूप में जन्म हुआ। बिरसा के पूर्वज चुटु और नागु मुंडा थे। वे पुर्ती गोत्र के थे, रांची के उपनगर चुटिया में रहे और कहा जाता है कि इन दोनों भाईयों के नाम से ही छोटानागपुर नाम पड़ा। बिरसा मुंडा अपने मामा घर में रहकर प्रारंभिक शिक्षा सलगा प्राथमिक विद्यालय से चंदा उर्फ जयपाल नाग के देख रेख में शिक्षा ग्रहण किया। इसके बाद आगे की पढ़ाई बुड़जु मिशन स्कूल से परीक्षा उतीर्ण के बाद बिरसा की प्रतिभा को देखकर पिता ने पैदल ही आगे की उच्च शिक्षा के लिए चाईबासा लूथरन मिशन स्कूल में फॉ डेडलॉक द्वारा पुष्टिकरण पंजीकरण 1886 की प्रविष्ट संख्या 178 में नामांकन हुआ। चाईबासा में 1886-1890 ई. तक रहा। फॉ डेडलॉक एक जर्मन शिक्षक थे, फॉदर नोत्रोत उस समय मिशन जगत के एक महान शिक्षक माने जाते थे। यूरोपिय शिक्षकों के सीधे संपर्क ने बिरसा मुंडा के जिज्ञासु मन समृद्धि किया और अपने समाज, देश की दुर्दशा पर चिंतन करने लगे। बंदगांव के जमींदार का मुंसी जो आध्यात्मिक गुरु आनंद पांड़ (स्वांसी जाति) ने उन्हें वैष्णव धर्म, रामायण, महाभारत और आयुर्वेद का ज्ञान दिया, जिससे उनमें धार्मिकता और नेतृत्व की चेतना विकसित हुई।

बिरसाइट धर्म और सामाजिक सुधार

बिरसा मुंडा ने बिरसाइट धर्म की स्थापना की, जो सिंगबोंगा (प्राकृतिक शक्ति/सर्वशक्तिमान) की उपासना पर आधारित था। उन्होंने समाज में सुधार के लिए सादगी, सत्य, स्वच्छता और अंधविश्वास-त्याग का संदेश दिया। प्रत्येक गुरुवार को सामूहिक प्रार्थना का प्रचलन उन्होंने शुरू किया, जो सामाजिक एकता का प्रतीक बना।

उलगुलान (1895–1900): स्वतंत्रता और अस्मिता का संघर्ष

               उलगुलान, यह आंदोलन ब्रिटिश शासन, जमींदारों और महाजनों के अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त जनविद्रोह था। बिरसा ने “अबुआ दिसुम अबुआ राज” का नारा दिया। अन्याय, अत्याचार एवं शोषण के खिलाफ बिरसा ने लोंगो को संगठित और जमीन लूट, लगान व्वस्था, अत्याचार आदि पर लड़ाई जारी थी। जिससे पुलिस डिप्टी सुपरिटेंडेंट जीआरके मेयर्स ने बिरसा को 22 अगस्त, 1895 को भारतीय  दंड संहिता 353 और 505 के तहत वारंट जारी कर गिरफ्तार किया गया। दो वर्ष की सश्रम कारावास के बाद विद्रोह की योजना, रणनीति बनाने लगे। फरवरी 1898 में डोंबारी पहाड़ी पर एक सभा की, जहाँ उन्होंने अपने शिष्यों को “टीका” लगाकर एकता की परिचित रस्म निभाया। इसके बाद पहाड़ी पर जुलूस निकाला गया और झंडे गाड़े गए और उनके चारों ओर नृत्य किया गया। इसके बाद बिरसा का भाषण हुआ और उन्होंने समझाया कि जो  सफेद और लाल दो झंडे लगाए गए थे, वे क्रमशः मुंडाओं और घुसपैठियों के थे। सफेद झंडे को उनके (विदेशियों) खून से तब तक लाल किया जाना था जब तक वह लाल झंडे जैसा न दिखने लगे।यह भी है कि मुंडाओं की सिङबोंगा (सर्वशक्तिमान/प्राकृतिकशक्ति) के नाम से सफेद मुर्गा और पहाड़ देवता के नाम से लाल मुर्गा बली दी जाती है। इस अवसर पर बाहरी लोगों (दिकुओं) के साथ होने वाली लड़ाई का खुलकर ज़िक्र किया गया। उन्होंने कहा कि –

 पुंडी रांबड़ा केचे- केचे,

हेंदे रांबड़ा केचे- केचे।

अर्थात गोरे अंग्रेज उनके लिए दुश्मन हैं साथ ही गोरे का साथ देने वाले चापलूसी किस्म के काले लोग भी उनके लिए परेशानी है।

डोम्बारी बुरु चेतान रे ओकोए दुमाङ रू तानाको सुसुनए ताना।

डोम्बारी बुरु लतार रे ओकोए बिंगुल साड़ि तानाको सांगिला कादा।

डोम्बारी बुरु चेतान रे बिरसा दुमाङ रू तानाको सुसुनए ताना।

डोम्बारी बुरु लतार रे सायोब बिंगुल साड़ि तानाको सांगिला कादा।

अर्थात डोम्बरी पहाड़ के ऊपर में कौन मांदर बचा रहा है और डोम्बारी पहाड़ के नीचे कौन बिगुल बजा रहा है। डोम्बरी पहाड़ के ऊपर में बिरसा मांदर बचा रहा है और डोम्बारी पहाड़ के नीचे साहब बिगुल बजा रहा है।

अन्य स्थानों पर लगातार होने वाली सभाओं में मुंडाओं की शिकायतें सुनाई गईं और स्वाभाविक रूप से सदियों से सोए हुए मुंडाओं की भावनाओं को जगाने के लिए तीखी भाषा का प्रयोग किया गया। बिरसा एक बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व थे और अपने श्रोताओं को उत्साहित करने का उनका तरीका अद्भुत था।  जगह-जगह बैठक बुलाने के लिए डोंका मुंडा को जिम्मेदारी मिली और वह हर जगह के बैठक को ग्राम सभा के माध्यम से सफल बनाया। बुंडू के तिलाइ मरचा में भी बिरसा मुंडा लोगों को संगठित करने के लिए आए। एटकेडी के गया मुंडा को सेनापति का प्रभारी बनाया। आदिवासियों को स्वतंत्रता संग्राम में नेतृत्व प्रदान करने के लिए बिरसा मुंडा ने डेमका मुंडा, परन मुंडा सुंदर मुंडा त्रिपु मुंडा जोहन मुंडा, दुखन स्वांसी, हाथीराम मुंडा, रिसा मुंडा आदि को विभिन्न क्षेत्र के लोगों को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए। बिरसा के अनुयायियों द्वारा पूर्व नियोजित हमलों की श्रृंखला शुरू हुई। सर्वाधिक स्थान पर हमले किए जाने लगे फादर कारबेरी के सीने में तीर मारी गई. फादर लस्टी पर भी तीर चलाई गई। 6 जनवरी 1900 को एटकेडीह में दो कांस्टेबल मारे गए। 7 जनवरी 1900 को खूंटी में एक कांस्टेबल की हत्या कर दी गई। फादर हॉफमेन भी बिरसा के तीर से अछूते नहीं रहे। सीएनटी एक्ट का प्रारूप तैयार करने में अहम भूमिका है। 8 जनवरी को सुबह 10 बजे कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर और अन्य अधिकारी सेना की दो टुकड़ियों के साथ खूँटी में थे। विद्रोह को दबाने के लिए युद्धस्तर पर तैयारी शुरू कर दी गई थी। 9 जनवरी, 1900 डोम्बरी बुरू में बिरसा के नेतृत्व में सभा हो रही थी का गुप्त सूचना पर डिप्टी कमिश्नर स्ट्रीटफील्ड, कैप्टन रोसे के साथ कांस्टेबलों की दल डोंबारी और साइल रकाब बुरू के बीच एक गहरा नाला है, पर दोनों पहाड़ियों एक स्थान पर घाटी के जरिए मिली हुई थी। उसी रास्ते से कांस्टेबल की दौड़ उठने लगी और बिरसा की अनुयाई डोम्बरी बुरू और साइल रकाब बुरू के ऊपर चोटी में थे। आपनी पारंपरिक हथियार से लैस थे परन्तु, स्ट्रीटफील्ड की सेना बंदुक पिस्तल से तैयार थे। इस प्रकार स्ट्रीट फील्ड के आदेश से सेना ने स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े पर गोलियां बरसाई गई। इससे हजारों की संख्या में शहीद हो गए। फिजंगियों को तीर-धनुष,  गुलेल, टांगी, फरसा, ढेलवांसा, पत्थर आदि से मारने लगे। इस प्रकार 9 जनवरी का उलगुलान भयाभय रहा।

डोम्बरी बुरू को टोपोटे बुरू यानि गोलीबारी पहाड़ भी कहा जाता है। दो हजार से ज़्यादा लोग मारे गए थे। अगली सुबह, अधिकारी जोजोहातु साप्ताहिक बाज़ार में लोगों को गोलीबारी में मारे गए मुंडाओं के अंतिम संस्कार में मदद के लिए प्रेरित कर रहे थे। सेना ने कई लोगों के शव पहाड़ियों की गहरी खाइयों और नालों में फेंक दिए। गुटुहातु में, दो बड़ी खाइयाँ खोदी गईं जिनमें कई शवों को दफनाया गया, कुछ घायलों को भी ज़िंदा दफनाया गया। पूरी पहाड़ी मृत मानव शवों से पटी पड़ी थी। डोम्बरी बुरू के नीचे एक खाई खोदी गई जिसमें महिलाओं को दफनाया गया. जिसे कुड़ीको तोपा गोड़ा यानि महिलाओं दफनाया गया मैदान।

पाक्षिक समाचार पत्र “घर बंधु” का प्रकाशन किया जाने लगा जो, हिंदी में पहला मुखपत्र था, जिसकी कीमत केवल दो पैसे थी। इसका संपादन डॉ. ए. नॉट्रोट ने किया और इसका मुद्रण और प्रकाशन एफ. मुलर ने जी. ई. एल. मिशन प्रेस, रांची से किया। आयुक्त श्री ए. फोर्ब्स ने सिरगुजा, उदयपुर, जशपुर, रंगपुर, बोनाई के प्रमुखों, रघुनाथ पट्टी के मानद मजिस्ट्रेट, संभलपुर के उपायुक्त और छत्तीसगढ़ के राजनीतिक एजेंट को नोटिस भेजे, जिसमें बिरसा का पूरा विवरण, उनकी आयु और पता अंकित था। अनुरोध किया गया कि बिरसा को गिरफ्तार करने वाले किसी भी व्यक्ति को 500 रुपये दिए जाने की अधिसूचना मुंडारी, बंगाली, हिंदी, उर्दू और उड़िया आदि में प्रकाशित की जाए।  फोर्ब्स ए., छोटानागपुर के कमिश्नर से नेटिव स्टेट्स को, दिनांक 5 फरवरी, 1900. फ्लाई लीफ संख्या 101-बीरेन होइट बिरसा 5’4″ इंच, रंग सांवला, उम्र 25, गुप्त फाइल (एस. सी. आर. ओ.), मनमारु और जरिकेल के सात आदमी 500 रु. के लालच और विश्वासघात में गिरफ्तार करवाने में 3 मार्च, 1900 को मदत की। बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर मुंडा प्रदेश के पहाड़ों और जंगलों से होते हुए बंदगाँव, खुंटी, डोरंडा, चुटिया होते हुए रांची लाया गया। रास्ते में अपने धरती-आबा के अंतिम दर्शन के लिए सैकड़ों लोग बाट जोह रहे थे। यह उनके जीवन की अंतिम यात्रा बन गई। उन्होंने सिर पर एक बड़ी पगड़ी (हिसिमुका पगरि, यानी बीस गज की पगड़ी), हाथ में बेड़ी लगी हुई थी और मुस्कुरा रहे थे।

बिरसा को जब डोरंडा पहुँचाया गया तो देखने वालों की संख्या बहुत बढ़ गई। सैन्य पुलिस की टुकड़ियाँ उनके दाएँ-बाएँ मार्च कर रही थीं और एक अनोखा दृश्य प्रस्तुत कर रही थीं। रांची, डोम्बारी के नायक को एक राष्ट्रीय योद्धा और अपने उद्देश्य के लिए लड़ने वाले के रूप में स्वीकार करने के लिए ब्रिटिश तैयार नहीं थी। उनके दिलों में इतना खौफ और आतंक व्याप्त था कि रांची बार का एक भी वकील बिरसा और अन्य मुंडाओं का बचाव करने के लिए तैयार नहीं था। मुकदमे के लिए सरकार को एक वकील नियुक्त करना पड़ा और उसकी मदद से बिरसाइतों पर नकली मुकदमा चलाया गया। उन्हें रांची जेल में कड़ी सुरक्षा में रखा गया और उन्हें उस मामले में मुख्य अभियुक्त बनाया गया। जाँच के लिए विशेष रूप से नियुक्त संयुक्त मजिस्ट्रेट डब्ल्यू.एस. कॉउट्स की अदालत में मुकदमा चलाया गया। पहले, जूनियर सिविल जज श्री जे.जे. प्लेटेल इन मामलों की जाँच कर रहे थे, लेकिन कलकत्ता के अखबारों में मुंडा कैदियों के ऐसे गुप्त मुकदमे के खिलाफ व्यापक विरोध होने के कारण उनकी जगह डब्ल्यू.एस. कॉउट्स को नियुक्त किया गया। बिरसा मुंडा को जेल में अनेक यातनाएँ दी गई। अंततः  9 जून 1900 को रांची जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में अपने देश, जल, जंगल और जमीन के लिए शहीद हो गए। धरती आबा, भगवान बिरसा मुंडा के रूप में सभी के दिलों में बस गए।

विरासत और प्रभाव 

बिरसा मुंडा के बलिदान का प्रतिफल छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 के रूप में सामने आया, जिसने जनजातीय भूमि अधिकारों की रक्षा की। उनका स्वशासन मॉडल — ग्रामसभा, अखड़ा, और सामुदायिक निर्णय — आज के विकेंद्रीकृत लोकतंत्र की जड़ में है। आदिवासी बुद्धिजीवी, साहित्यकार पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा, 1986–87 की परिकल्पना से बिरसा मुंडा की उलगुलान में शहीदों के स्मृति में डोम्बारी बुरु पर 110 फीट ऊँचा शहीद स्तंभ, एक विशाल मूर्ति और अखड़ा बनाया गया है। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा भारतीय जनजातीय अस्मिता, पर्यावरणीय न्याय और आत्मनिर्भरता के अमर प्रतीक हैं। उनका संदेश “अबुआ दिसुम अबुआ राज” आज भी स्वशासन और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा देता है। 15 नवम्बर को झारखंड स्थापना दिवस और जनजातीय गौरव दिवस  के रूप में मनाया जाना उनके विचारों के पुनरुत्थान का प्रतीक है। 150 वीं जयंती के रूप में संपूर्ण देश में मनाया जा रहा है।

संदर्भ- 1. एसपी सिन्हा, लाइफ एंड टाइम्स ऑफ़ बिरसा भगवान

  1. कुमार सुरेश सिंह, बिरसा मुंडा और उनका आन्दोलन

डॉ अजीत मुंडा, ajitmundas@gmail.com

Birsa Munda 150 Jayanti Birsa Munda History CNT Act 1908 Jharkhand Tribal News Tribal Freedom Fighter उलगुलान जनजातीय आंदोलन जल जंगल जमीन डोम्बारी बुरू बिरसा मुंडा
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