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Home»#Trending News»रांची विश्वविद्यालय में शोध, भाषा संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों पर विशेष व्याख्यान आयोजित
#Trending News

रांची विश्वविद्यालय में शोध, भाषा संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों पर विशेष व्याख्यान आयोजित

अधिवक्ता शुभाशीष रसिक सोरेन ने शोध की प्रमाणिकता और जनजातीय भाषाओं के संवैधानिक संरक्षण पर दिया जोर
अबुआ न्यूजBy अबुआ न्यूजMay 2, 2026No Comments3 Mins Read
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रांची: रांची विश्वविद्यालय के पीजी मुंडारी विभाग में शनिवार को शोध कार्य, भाषा संरक्षण एवं संवैधानिक प्रावधानों पर एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में झारखंड उच्च न्यायालय, रांची के अधिवक्ता एवं पूर्व न्यायिक दंडाधिकारी शुभाशीष रसिक सोरेन उपस्थित रहे। इस व्याख्यान में शोध कार्य की गुणवत्ता, भाषा संरक्षण और संविधान में जनजातीय भाषाओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। अपने व्याख्यान में शुभाशीष रसिक सोरेन ने “शोध की सावधानियां और संकलित सामग्री की प्रमाणिकता” विषय पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी शोध की सफलता उसके स्रोतों की विश्वसनीयता, तथ्यात्मक सत्यता और व्यवस्थित अध्ययन पर आधारित होती है। शोधार्थियों को उन्होंने सलाह दी कि वे शोध सामग्री का चयन करते समय प्रमाणिक स्रोतों का उपयोग करें तथा तथ्यों का उचित सत्यापन अवश्य करें। उन्होंने शोध कार्य में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि विषय चयन, सामग्री संग्रह, संदर्भों की प्रामाणिकता और विश्लेषण की प्रक्रिया शोधार्थियों के लिए चुनौतीपूर्ण होती है। इन समस्याओं के समाधान के लिए उन्होंने शोध में अनुशासन, निरंतर अध्ययन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा कि गुणवत्तापूर्ण शोध समाज और भाषा दोनों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

व्याख्यान के दौरान उन्होंने भारतीय संविधान में भाषाई और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े विभिन्न प्रावधानों की विस्तृत जानकारी दी। विशेष रूप से जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन से संबंधित संवैधानिक उपबंधों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि संविधान आदिवासी भाषाओं को संरक्षित रखने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि इन संवैधानिक अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन से मुंडारी जैसी जनजातीय भाषाओं को नई पहचान और मजबूती मिल सकती है। मुख्य वक्ता ने मुंडारी भाषा-साहित्य के विकास के लिए एक बृहद एवं मानकीकृत शब्दकोश के निर्माण की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उनका मानना था कि किसी भी भाषा के संरक्षण और विकास के लिए उसका व्यवस्थित शब्द-संग्रह अत्यंत आवश्यक होता है। उन्होंने शोधार्थियों और शिक्षकों से इस दिशा में सामूहिक प्रयास करने की अपील की।

इस अवसर पर डॉ. करम सिंह मुंडा सहित विभाग के शिक्षकगण और बड़ी संख्या में शोधार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने व्याख्यान को अत्यंत ज्ञानवर्धक, समसामयिक और प्रेरणादायक बताया। अंत में विभागाध्यक्ष डॉ. बीरेन्द्र कुमार सोय ने अतिथि वक्ता शुभाशीष रसिक सोरेन के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के व्याख्यान शोधार्थियों को नई दृष्टि प्रदान करते हैं और शोध कार्य को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता करते हैं। धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

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