रांची: रांची विश्वविद्यालय के पीजी मुंडारी विभाग में शोध कार्य पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस शैक्षणिक कार्यक्रम में जनजातीय भाषा और साहित्य के क्षेत्र में गहन विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. रामदयाल मुण्डा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची के पूर्व उपनिदेशक सोमा सिंह मुण्डा उपस्थित रहे। सोमा सिंह मुण्डा ने “मुण्डारी भाषा साहित्य के विकास में अन्य भाषाओं का प्रभाव” विषय पर विस्तारपूर्वक व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने संबोधन में मुण्डारी भाषा के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने यह बताया कि अन्य भाषाओं के संपर्क से मुण्डारी भाषा में किस प्रकार परिवर्तन और समृद्धि आई है। उन्होंने भाषा के विकास में संपर्क, आदान-प्रदान और आधुनिक संदर्भों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने मुण्डारी साहित्य के विकास के लिए एक बृहद एवं प्रमाणिक शब्दकोश के निर्माण की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उनका कहना था कि किसी भी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए शब्दकोश अत्यंत आवश्यक होता है, क्योंकि यह भाषा के शब्द-भंडार को व्यवस्थित और संरक्षित करता है। उन्होंने शोधार्थियों को इस दिशा में पहल करने के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त, श्री मुण्डा ने शोध कार्य में आने वाली विभिन्न चुनौतियों पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान विषय चयन, सामग्री संग्रह, भाषा की शुद्धता और संदर्भों की प्रामाणिकता जैसे कई मुद्दे सामने आते हैं। इन चुनौतियों का समाधान कैसे किया जाए, इस पर भी उन्होंने विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने शोधार्थियों को निरंतर अध्ययन, अनुशासन और समर्पण के साथ कार्य करने की सलाह दी।
कार्यक्रम में मुंडारी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बीरेन्द्र कुमार सोय, डॉ. करम सिंह मुंडा सहित विभाग के अन्य शिक्षक एवं बड़ी संख्या में शोधार्थी उपस्थित रहे। सभी प्रतिभागियों ने व्याख्यान को अत्यंत ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक और उपयोगी बताया। कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों ने भी अपने प्रश्न रखे, जिनका मुख्य वक्ता ने संतोषजनक उत्तर दिया। कार्यक्रम के अंत में विभागाध्यक्ष डॉ. बीरेन्द्र कुमार सोय ने अतिथि वक्ता के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के व्याख्यान शोधार्थियों के बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने श्री सोमा सिंह मुण्डा के महत्वपूर्ण मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया। इस प्रकार यह शैक्षणिक कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी एवं प्रेरणादायक सिद्ध हुआ।

