रांची: रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की वरिष्ठ शिक्षिका, प्रसिद्ध साहित्यकार और नागपुरी भाषा-साहित्य की मजबूत आधारस्तम्भ डॉ. कुमारी बासन्ती का आज पूर्वाह्न निधन हो गया। उनके निधन से झारखंड के भाषा और साहित्य जगत में शोक की लहर है। डॉ. कुमारी बासन्ती का जीवन जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए समर्पित रहा। उन्होंने वर्षों तक विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और अनेक विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों को मार्गदर्शन दिया। उनके छात्र उन्हें स्नेह से “दीदी” कहकर पुकारते थे। वे हमेशा छात्रों की समस्याएं सुनती थीं और उन्हें सही दिशा दिखाती थीं। उन्होंने केवल पढ़ाने का काम ही नहीं किया, बल्कि भाषा और संस्कृति के लिए आंदोलन भी किए। उन्होंने जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान दिलाने के लिए लगातार प्रयास किया। उनका मानना था कि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व का आधार है।
डॉ. बासन्ती अपनी स्पष्टवादिता और निडर स्वभाव के लिए जानी जाती थीं। वे हमेशा सच को साफ शब्दों में कहती थीं। शैक्षणिक और साहित्यिक चर्चाओं में उनके विचार मजबूत और तार्किक होते थे। वे एक अच्छी शिक्षिका के साथ-साथ एक जागरूक विचारक भी थीं। वे हमेशा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की प्रगति और एकता के बारे में सोचती थीं। उनका मानना था कि विभाग की एकता ही झारखंड की एकता है। उन्होंने इस विभाग को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस कार्य में डॉ. रामदयाल मुंडा, डॉ. बी.पी. केशरी और गिरिधारी राम गौंझू आदि विद्वान साथ मिलकर झारखंडी भाषाओं की पहचान को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई। आज उनके निधन से झारखंडी साहित्य ने एक मजबूत आवाज खो दी है। यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि एक युग का अंत जैसा है। उनकी कमी को पूरा करना आसान नहीं होगा। डॉ. कुमारी बासन्ती अपने कार्य, विचार और संघर्ष के कारण हमेशा याद की जाएंगी। उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

